Monday, March 30, 2026

भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम ------ डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

 
भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम
(एकरेखीय विकास यात्रा)
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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भारत  का  इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और विविधतापूर्ण   है, जिसमें सत्ता के केंद्र —अर्थात् राजधानियाँ—समय-समय पर बदलती  रही  हैं। इन  परिवर्तनों  के  पीछे राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण निहित थे। यदि हम इन राजधानियों को एकरेखीय क्रम में देखें, तो भारतीय इतिहास की एक स्पष्ट और सतत धारा हमारे सामने उभरती है।
प्राचीन भारत में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) एक अत्यंत   महत्त्वपूर्ण   एवं प्रभावशाली राजधानी रही। इसे एक सुदृढ़ राजधानी के रूप में स्थापित करने में महापद्मनंद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने सोलह महाजनपदों को अपने अधीन कर एक विशाल और सशक्त राज्य की आधारशिला रखी। बाद   में   मौर्य  और  गुप्त   जैसे   महान साम्राज्यों ने यहीं से शासन किया। चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के काल में यह नगर अपनी चरम   उन्नति   पर पहुँचा। गंगा के किनारे स्थित होने   के   कारण   यह   व्यापार, प्रशासन और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बना रहा।
प्राचीन  भारत   में  जहाँ   पाटलिपुत्र जैसे   नगर व्यापक साम्राज्यों की राजधानी रहे, वहीं अनेक क्षेत्रीय   राजधानियाँ   भी अपने-अपने स्तर पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण थीं। उदाहरणतः मथुरा शूरसेन जनपद   की   राजधानी   थी   और धार्मिक तथा सांस्कृतिक  दृष्टि  से  अत्यंत   समृद्ध  केंद्र  रहा, जबकि हस्तिनापुर  कुरु  राज्य  की राजधानी के रूप   में  विख्यात था। यद्यपि   ये  नगर  सम्पूर्ण  भारत  की   राजधानियाँ नहीं थे, तथापि इन्होंने प्राचीन भारतीय सभ्यता, राजनीति और संस्कृति के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मध्यकाल  में  दिल्ली सल्तनत के उदय के साथ सत्ता का  केंद्र   दिल्ली बना। हालांकि, मोहम्मद बिन   तुगलक   ने राजधानी को दक्षिण भारत के दौलताबाद (पूर्व नाम देवगिरि) स्थानांतरित करने का प्रयास किया था। इसका उद्देश्य साम्राज्य पर बेहतर  नियंत्रण   स्थापित  करना था, किंतु यह प्रयोग सफल नहीं हो सका और अंततः राजधानी पुनः दिल्ली लौटा दी गई।
मुगल काल में भी राजधानियों में परिवर्तन देखने को मिलता   है।   प्रारंभ में आगरा को राजधानी बनाया   गया,   जहाँ   से अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ   ने   शासन   किया।  इसके   पश्चात्   शाहजहाँ   ने दिल्ली में शाहजहाँनाबाद बसाकर उसे राजधानी   बनाया।   इस काल में इलाहाबाद  (प्रयाग)   भी   पूर्ण   राजधानी  न   होकर   एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक और सामरिक केंद्र के रूप में उभरा।
ब्रिटिश   काल   में    प्रारंभ   में कलकत्ता   (अब कोलकाता) को भारत की राजधानी बनाया गया, जो   व्यापार   और   प्रशासन    का प्रमुख   केंद्र    था। किन्तु 1911 में ब्रिटिश सरकार ने राजधानी को पुनः  दिल्ली  स्थानांतरित   कर  दिया, ताकि भारत  के  उत्तरी और मध्य भागों पर प्रशासनिक नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।
15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी दिल्ली को ही भारत की राजधानी बनाए रखा गया। आज   नई   दिल्ली भारत का राजनीतिक,  प्रशासनिक  और कूटनीतिक केंद्र है। यदि भारत की राजधानियों   का   एकरेखीय  क्रम निर्धारित किया जाए, तो वह इस प्रकार उभरता है—
पाटलिपुत्र → दिल्ली → दौलताबाद (अल्पकालिक) → दिल्ली →
आगरा → दिल्ली → कलकत्ता → दिल्ली (वर्तमान)
अंततः   कहा   जा‌  सकता   है   कि भारत  की राजधानियों   का ‌ यह   परिवर्तन   केवल   स्थान परिवर्तन   नहीं था, बल्कि  यह समय-समय पर बदलती  राजनीतिक   परिस्थितियों, प्रशासनिक आवश्यकताओं   और   साम्राज्य   विस्तार  की रणनीतियों का दर्पण भी था। यह क्रम भारतीय इतिहास   की   गतिशीलता,   निरंतरता   और विकासशीलता   को  स्पष्ट   रूप  से प्रतिबिंबित करता है।
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 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Sunday, March 29, 2026

खतरनाक साजिश ------ Ansh Kidsplay


:
 ·
⁉️ क्या आपको पता है कि हम भारतीय एक खतरनाक साजिश का शिकार हो चुके हैं और वह साजिश है हमारे संयुक्त परिवारों को तोड़कर उन्हें उपभोक्ता बनाने की..???
 जब परिवार टूटते हैं, तभी बाजार फलते फूलते हैं— ये सिर्फ विचार नहीं, पूरी रणनीति है ....
भारत की सबसे मजबूत चीज क्या थी..???
भारत पर मुगल आए, अंग्रेज़ आए, और कई हमलावर आए लेकिन एक चीज कभी नहीं टूटी, वो थी एकता....??
  3 पीढ़ियाँ एक छत के नीचे रहती थी बुज़ुर्गों का अनुभव बच्चों में संस्कार खर्च में सामूहिकता और त्यौहारों में गर्माहट हुआ करती थी...
यह हमारी असली “Social Security” थी। कोई पेंशन की ज़रूरत नहीं थी, कोई अकेलापन नहीं, कोई Mental Health Crisis नहीं।
पश्चिमी देशों को यह चीज खटकने लगी और उन्होंने परिवारों को तोड़ने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया..???
क्योंकि पश्चिमी देश हमेशा से ही उपनिवेशवादी रहे हैं — उनके लिए बाज़ार सबसे बड़ा धर्म है??
लेकिन भारत जैसा देश, जहाँ लोग साझा करते हैं, कम खर्च करते हैं, और सामूहिक सोच रखते हैं — वहां वे अपने उत्पाद बेच ही नहीं पा रहे थे।
इसलिए एक शातिर रणनीति बनाई गई...???
इनके परिवार ही तोड़ दो, हर कोई अकेला हो जाएगा,और हर कोई ग्राहक बन जाएगा।
कैसे हुआ ये हमला..???
1.मीडिया का सहारा लेकर संयुक्त परिवारों को तोड़ने की शुरुआत...
संयुक्त परिवार को “झगड़ों का अड्डा”, “बोझ” और “रुकावट” के रूप में दिखाया गया।
न्यूक्लियर परिवार को “फ्रीडम”, “मॉर्डन”, “Self-made” बताकर  ग्लैमराइज किया गया।
याद कीजिए: टीवी पर आज भी कितने ही शो हैं जहां पूरे दिन बहू-सास की लड़ाई, नन्द भाभी की लड़ाई, देवरानी जिठानी की लड़ाई पूरे दिन दिखाई जाती है, और हमारे/आपके परिवार की घरेलू औरतें पूरे दिन यही धारावाहिकों को देखती है और इनका निष्कर्ष/सॉल्यूशन निकलता है – “अलग हो जाओ!”
 2. उपभोक्तावाद के ज़रिए...
जब हर जोड़ा अलग रहने लगा...
पश्चिमी देशों अपनी चाल में कामयाब हुए और हमारे परिवार विखर का उनका बाजार बन गए 
पहले 1 परिवार में चार भाई रहते थे, अब एक परिवार सिर्फ चार लोग (पति-पत्नी, और 2 बच्चे)
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 टीवी, अब 4 भाईयों के बीच 4 टीवी
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 रसोई, अब 4 भाईयों के बीच 4 किचन सेट
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 कार और 1 मोटरसाइकिल, अब 4 भाईयों के बीच 4 कार, 4स्कूटी और 4 मोटरसाइकिल।
बाजार में बूम आ गया – और समाज में टूटन।
भारत में क्या हुआ इस “सोचलेवा हमले” के बाद?
 सामाजिक पतन...???
 बुज़ुर्ग अब बोझ हैं
 बच्चे अकेले हैं (और स्क्रीन में गुम)
 रिश्तेदार “उपलब्ध नहीं” हैं
 संस्कारों की जगह “Influencers” ने ले ली
मानसिक स्वास्थ्य संकट...???
 पहले जो बात नानी-दादी से होती थी, अब काउंसलर से होती है...
 अकेलापन अब इलाज़ मांगता है, पहले प्यार से दूर होता था
 बाजार का फायदे...????
 हर समस्या का एक उत्पाद
 हर भावना का एक ऐप
 हर उत्सव का एक“ *ऑनलाइन ऑर्डर”
“संस्कार की जगह सब्सक्रिप्शन ने ले ली है”
आज का सवाल — हम क्या बनते जा रहे हैं?
हमने “आधुनिकता” की दौड़ में...???
 संयुक्तता को “Old culture” कहा...
 माता-पिता को “Obstacles” कहा...
 परिवार को “फालतू भावना” कहा...
 रिश्तों को “Unfollow” कर दिया...
लेकिन क्या आपने सोचा..???
Amazon का फायदा तभी है जब आप Diwali पर अकेले हों — और Shopping करें, परिवार के साथ न बैठें।
Zomato तभी कमाता है जब कोई माँ का खाना नहीं खा रहा।
Netflix तभी देखेगा जब कोई दादी की कहानी नहीं सुन रहा।
समाधान: हम अभी भी वापसी कर सकते हैं???
 संयुक्त परिवार को पुनः “संपत्ति” मानें, बोझ नहीं।
 बच्चों को उपभोक्ता नहीं, संस्कारी इंसान बनाएं।
 बुज़ुर्गों को घर से बाहर न करें — उनके अनुभव हर Google Search से ऊपर हैं।
त्यौहार मनाएं, सामान नहीं।
अकेलापन कम करने के लिए App नहीं, अपनापन बढ़ाइए।
निष्कर्ष :--
“पश्चिम ने व्यापार के लिए परिवार तोड़े,और हम ‘आधुनिक’ बनने के लिए अपना वजूद बेच आए।”
अब समय है रुकने का, सोचने का, और अपने संस्कारों को फिर से अपनाने का — नहीं तो अगली पीढ़ी को ‘संयुक्त परिवार’ शब्द का अर्थ बताने के लिए भी शायद Google की जरूरत पड़ेगी l
क्या आपको नहीं लगता कि हम  ज़िन्दगी की सुख सुविधाओं के लिए अपने परिवारिक माहौल के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं हम अपनी असल जिंदगी खोते जा रहे हैं,हम स्वार्थी हो रहे हैं एक बार अपना 30 बर्ष पुराना जीवन याद करके देख लो, जहां सिर्फ भाईचारा था इमोशन था कोई सोसाइड नहीं करता था, सहयोग की भावना थी, संस्कार ऐसे कि गांव के हर आदमी को पिता जितना सम्मान दिया जाता था किन्तु आज तो पिता ही "यार पापा" हो गए , और आज यही संस्कार हमारी आधुनिकता को दर्शाती है और हमें घिन आती है ऐसी आधुनिकता पर, कृपया एक बार विचार अवश्य करें।

                                                                             
                                                                     लेखिका ---  Ansh Kidsplay

  ~विजय राजबली माथुर ©



























Saturday, March 28, 2026

निकृष्ट तम कृत्य : PM Care fund. ------ Kanupriya

जब आप जीवन मे सबसे बुरी परिस्थिति में हों तब क़िस्म क़िस्म के लोग मिलते हैं; 
 एक वे जो आपको  अपनी क्षमता अनुसार राहत देते हैं, और उतना ही उपकार समझ जो जितना साथ निभा दे की तर्ज़ पर आप हमेशा उनके शुक्रगुजार रहते हैं . 
फिर वे जो किसी भी कारण या परिस्थिति वश दूर से दृष्टा रहते हैं,   जिनके कारण न आपको फ़ायदा होता है न नुकसान. दुनिया मे हर व्यक्ति आपकी मदद की capacity में भी नही होता, आपके जीवन मे involve भी नहीं होना चाहता,  तो ये भी ठीक ही है.
   हाँ जिनसे आपका उम्मीद का रिश्ता हो वे भी दृष्टा रहें तो थोड़ी तकलीफ़ होती है.
 फिर वे जो मदद का दिखावा करते हैं मगर दरअसल करते कुछ भी नहीं,  ऐसे लोगों को पहचानना थोड़ा मुश्किल होता है, वे भले और मीठे बने रहते हैं, उम्मीद बनाए रखते हैं, मगर अंततः आपको अपने अनुभव से समझ आ जाता है कि इनसे उम्मीद रखना बेकार है. ये आपके समय की सबसे बड़ी हानि करते हैं. 
फिर वे लोग भी मिलते हैं  जो मदद करने को तैयार होते हैं मगर आपसे बदले में भी कुछ चाहते हैं, और सीधे सीधे कह देते हैं, ऐसे में आपके पास अपने लिये तय करने का अधिकार रहता है. और अगर आप बेहद ही कमज़ोर मानसिकता में न हों कि ख़ुद को छलने के लिये भी तैयार हों तो अपने लिये कैसा भी निर्णय कर ही लेते हैं. 
फिर वे लोग होते हैं, जिनका आपको पता होता है कि वे आपका बुरा ही चाहते हैं और वे अपनी नीयत को अपनी बात या व्यवहार से  छुपाते भी नहीं. आपका दुख उनके लिये ख़ुशी का सबब होता है, और आपको उनसे डील करना सीखना होता है. 
 यहाँ तक भी ठीक है आप मैनेज कर लेते हैं. 
मगर सबसे ख़तरनाक वे होते हैं जो आपकी बुरी आर्थिक,मानसिक या भावनात्मक स्थिति का अपने पक्ष में फ़ायदा उठाते हैं यानी राहत का दिखावा करते हैं , आपका भरोसा जीतते हैं, उम्मीद जगाते हैं मगर असल मे अपना ही उल्लू सीधा करते हैं. ऐसे लोग जीवन के सबसे कड़वे , न भूलने वाले अनुभव देते हैं. 
ये ऐसा ही है जैसे किसी रेल दुर्घटना में घायल व्यक्ति की तरफ़ मदद का हाथ बढाकर उसके कंगन लूट लिए जाएँ, और फिर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाए.  ऐसे में नुकसान सिर्फ़ कंगन का नही होता, इंसानियत पर से ही भरोसा उठ जाता है.  
 किसी दूसरे की आपदा में अपने लिये अवसर खोजने वाले लोग निकृष्टतम होते हैं , और इसमें कोई दोराय भी नहीं.
और मुझे अब तक का इस सरकार का सबसे निकृष्ट तम कृत्य लगा PM Care fund. संकट से जूझती जनता को उसके हाल पर छोड़ देने, चुनी हुई सरकार से होने वाली उम्मीद और भरोसे पर खरा न उतरने से भी ज़्यादा. 
सिर्फ़ PM fund नाम होता तब भी ग़नीमत थी, आपने जनता को भरोसा दिलाया कि आप care करते हैं, आप मदद करना चाहते है , आपने जनता से अपील की कि देश की मदद के लिये आपदकाल में भी चंदा दें, यहाँ तक आपने उसके नाम पर लोगों की सैलरी तक काट ली, और फिर जब लोगों के घरों में चिताएँ जल रही थी,  वह तमाम धन आप ग़बन कर गए, न आपने मदद की न हिसाब दिया,  तिसपर मीडिया की मदद से अपनी संत और savior की छवि भी बनाए रखी. 
इससे घटिया, इससे नीच भी कुछ हो सकता है?
अब जब सरकार की तरफ़ से संकटकाल की घोषणा हो ही चुकी है, और कल प्रधानमंत्री जी के कुल भाषण का सार " जो उचित समझो वो करो", यानी उपदेश देकर जनता को उसके हाल पर छोड़ देना ही है, तब सरकार से एक ही अंतिम उम्मीद है, जनता अपना ओढ़ खींच लेगी;
बस अबकी बार आप संकटग्रस्त जनता से  किसी राहत और केयर के नाम पर फण्ड मत माँगना, इतना रहम करना. बाक़ी जो अभी तक अपने अनुभव से ये नहीं समझे कि इस सरकार से किसी तरह की उम्मीद का रिश्ता नही रखना चाहिये, उनका ऊपर वाला ही मालिक है.


                                                                      

                                                      लेखिका ---   Kanupriya


 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Tuesday, March 24, 2026

ममता बनर्जी की संभावनाएं ------ विजय राजबली माथुर

 


Friday, October 19, 2012

 "ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं ? "

उद्धृत लेख द्वारा मैंने स्पष्ट किया था :

पुराने अखबारों का अवलोकन करते समय सुश्री ममता बनर्जी की यह जन्मपत्री दिखाई दे गई जिसमे सन 2002 तक का उनका भविष्य लेखक ने अपनी थ्यौरी से दिया था। उसके सही-गलत होने की विवेचना मैं नहीं कर रहा हूँ। मैंने विगत विधानसभा चुनावों से पूर्व अपने एक लेख द्वारा ममता जी की कटु राजनीतिक आलोचना भी की थी और पश्चिम बंगाल की जनता से आह्वान भी किया था कि वह ममता जी को सत्तारूढ़ न होने दे। परंतु ममता जी मुख्यमंत्री बनी और बड़ी शान से बनीं। इसलिए भी कौतूहल था उनका भविष्य जानने का और इसलिए भी कि दार्जिलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी मे 8वी कक्षा से 10वी बोर्ड की परीक्षा पास करने तक रहने के कारण बंगाल की राजनीति मे दिलचस्पी सदा ही रही है। वहाँ से 10-15 किलोमीटर दूर ही है नक्सल बाड़ी जहां 1967 मे 'नक्सल बाड़ी से नल बाड़ी तक' आंदोलन हमारे रहते ही शुरू हुआ था। इस आंदोलन का सम्पूर्ण लाभ राजस्थान के मारवाड़ियों को हुआ था जिनको इंश्योरेंस क्लेम नुकसान से कहीं बहुत ज़्यादा मिला था। अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर आज भी मैं ममता जी का समर्थक नहीं हूँ,परंतु उनके ग्रह-नक्षत्र जो बोल रहे हैं उनको झुठलाया भी तो नहीं जा सकता। misuse of knowledge भी मैं नहीं कर सकता। अतः ममता जी की कुंडली का वैज्ञानिक निष्पक्ष  विश्लेषण प्रस्तुत करने मे कोई पूर्वाग्रह(IBN7 के प्रतिनिधि ब्लागर एवं उनकी  सहयोगी पूना प्रवासी ब्लागर की भांति जो ज्योतिष को मीठा जहर कहते हैं ) भी नहीं है। 



ममता जी की प्रस्तुत जन्मपत्री के अनुसार उनका जन्म लग्न-मकर है और---



द्वितीय भाव मे कुम्भ का 'मंगल'



पंचम भाव मे वृष का 'चंद्रमा'



षष्ठम भाव मे मिथुन का 'केतू'



सप्तम भाव मे कर्क का 'ब्रहस्पति'



दशम भाव मे तुला का 'शनि'



एकादश भाव मे वृश्चिक का 'शुक्र'



द्वादश भाव मे धनु के 'सूर्य','बुध' और 'राहू'



अखबारी विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण यह है कि जन्म के बाद ममता जी की 'चंद्र महादशा' 07 वर्ष 08 आठ माह एवं 07 दिन शेष बची थी। इसके अनुसार 03 जूलाई 2010 से वह 'शनि'महादशांतर्गत 'शुक्र' की अंतर्दशा मे 03 सितंबर 2013 तक चलेंगी। यह उनका श्रेष्ठत्तम समय है। इसी मे वह मुख्य मंत्री बनी हैं। 34 वर्ष के मजबूत बामपंथी शासन को उखाड़ने मे वह सफल रही हैं तो यह उनके अपने ग्रह-नक्षत्रों का ही स्पष्ट प्रभाव है। 



इसके बाद पुनः 'सूर्य' की शनि मे  अंतर्दशा 15 अगस्त 2014 तक  उनके लिए अनुकूल रहने वाली है और लोकसभा के चुनाव इसी अवधि के  मध्य होंगे। केंद्र (दशम भाव मे )'शनि' उनको 'शश योग' प्रदान कर रहा है   

जो 'राज योग' है।



ममता जी को समयानुकूल सही बात कहने व उठाने का विलक्षण लाभ भी   उनके ग्रह प्रदान कर रहे हैं   

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आजकल इधर कई यू ट्यूब चेनल्स पर दिग्गज ज्योतिषी गण ' ममता बनर्जी ' के सत्ता वापसी को असंभव  बताते नहीं थक रहे है ऐसा  कर वे सत्तारूढ़ केंद्र सरकार से  पुरस्कार प्राप्त कर सकते हैं। 

मेरे अपने आँकलंन  के अनुसार ०६ फरवरी २०२६ से ०६ दिसंबर २०२८ तक ममता जी की बुध महादशान्तर्गत ' शुक्र' की अंतर्दशा चल रही है जो सुखदायक और श्रेष्ठ है उसके बाद भी ०९ मार्च २०३२ तक  ममता जी का समय लाभदायक,श्रेष्ठ और राज्य वृद्धिदायक होगा। अतः यदि व्यापक हेराफेरी ,धांधली और धूर्तता कामयाब न हो तो ममता जी की पुनः जीत अवश्य ही होगी। हम उनकी सफलता के लिए  मंगलकांनाएं। 











 ~विजय राजबली माथुर ©

Friday, October 17, 2025

स्वयंवर की जीत : स्त्री ने तोड़ी रूढ़ियों की जंजीर ------ डॉ. गिरीश कुमार वर्मा


Danda Lakhnavi
15 Oct 2025
 
 
 ·
स्वयंवर की जीत : स्त्री ने तोड़ी रूढ़ियों की जंजीर
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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सभा  में  सैकड़ों  राजकुमार  खड़े  हैं।  सबकी  निगाहें  एक  कन्या पर टिकी हैं— हाथ में माला, मन में  साहस।  मंच पर सजी यह माला केवल वरमाला नहीं, बल्कि युगों की जंजीरों को तोड़ने का साहस है। वह न किसी कुल की कैदी है, न  किसी  परंपरा   की। आज  वह  चुनने  आई है— अपने जीवन का साथी, अपने  विवेक  से।  यह केवल  विवाह  नहीं, यह  एक घोषणा  है— “मैं चुनूंगी!” यही था— स्वयंवर।
वर्ण की दीवारें
प्राचीन भारत में समाज को चार वर्गों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र— में बंटा था। व्यक्ति की योग्यता नहीं, उसके  जन्म  का  कुल तय करता था कि वह क्या करेगा, कहाँ बैठेगा और किससे  विवाह  करेगा।  प्रेम करना तो दूर की बात, प्रेम  के  बारे  में  सोचना भी अपराध  समझा  जाता   था। जन्म  और  जन्मपत्री  से  जीवनपत्र  लिख  दिया  जाता  था— और समाज  उस  पर  मुहर लगा देता था। ऐसे  समय  में  स्वयंवर  प्रथा ने रूढ़ियों की दीवार पर पहली चोट की। यह वह मंच था जहाँ कन्या को वर चुनने की स्वतंत्रता दी जाती थी— न कुल-गोत्र का भय, न वर्ण की दीवार, केवल एक प्रश्न— “कौन योग्य है?”
एक कवि ने बिल्कुल ठीक कहा—
“वर्ण व्यवस्था में रहे, युवजन हृदय मसोस!
मिला स्वयंवर-प्रथा में,उनको अति संतोष!!”
दुष्यंत–शकुंतला : जब प्रेम ने वर्ण को हराया
महर्षि  कण्व  की कुटिया में जब राजा दुष्यंत ने शकुंतला  को  देखा,  वहाँ  न  कोई सभा थी, न प्रतियोगिता— वहाँ थीं भावनाएँ, संवेदनाएँ और स्वीकृति की नीरव गूँज। यह प्रेम का स्वयंवर था, जहाँ कुल या वर्ण की दीवारें पिघल गईं। दुष्यंत और शकुंतला का मिलन  भारतीय  समाज  की  पहली भावनात्मक क्रांति थी — जिसने कहा, “प्रेम न जाति पूछता है, न वंश; वह तो बस दिल की बात सुनता है।”
कालिदास–विद्योतमा : बुद्धि का स्वयंवर
इतिहास  ने  एक  और  अद्भुत  स्वयंवर  देखा— विद्योतमा नामक विदुषी ने शर्त रखी, “जो मुझे शास्त्रार्थ में पराजित करे, वही  मेरा  वर  होगा।” यहाँ न राजवंश था, न सत्ता— केवल ज्ञान और तर्क   की   परीक्षा  थी।  कहते    हैं,  भाग्यवश कालिदास चुने गए, पर बाद में उन्होंने विद्योतमा के ज्ञान को अपनी प्रेरणा बना लिया। यह स्वयंवर बुद्धि की प्रतिष्ठा था, जिसने पुरुष-प्रधान समाज में स्त्री की मेधा को मान्यता दी।
स्वयंवर – स्वतंत्रता का सामाजिक उद्घोष
चाहे  दुष्यंत–शकुंतला  का  भावनात्मक स्वयंवर हो या विद्योतमा–कालिदास का बौद्धिक स्वयंवर— दोनों  ने  समाज  को  एक  ही संदेश  दिया— “विवाह केवल संस्कार नहीं, चयन का अधिकार है।” स्वयंवर  प्रथा  में  स्त्री  को “दी जाने वाली वस्तु” नहीं, बल्कि “निर्णय लेने वाली  व्यक्ति”  के रूप में मान्यता मिली। यही भारतीय समाज में स्त्री– स्वतंत्रता का पहला सामाजिक उद्घोष था।
विश्व में स्वयंवर की गूँज
भारत  की  यह  परंपरा  अकेली नहीं थी। दुनिया  के  कई  हिस्सों में भी स्त्री–चयन के विविध रूप मिलते हैं। यूनान  में  हेलन  ऑफ  ट्रॉय  जैसी  कथाओं में राजकुमारियाँ अपने  वर  का  चुनाव  करती  थीं। नॉर्स  देशों  में  वीरांगनाएँ  युद्ध  में  विजयी  योद्धा को पति के रूप में स्वीकारती थीं। सेल्टिक समाज में स्त्रियाँ अस्थायी विवाह के बाद स्वतंत्र  रूप  से  निर्णय  कर सकती थीं। चीन में  “ब्राइड शो”  आयोजित  होते  थे, जहाँ  सम्राट देशभर  की  युवतियों  में  से चयन करता था— यद्यपि भारत के समान स्वतंत्रता वहाँ नहीं थी।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि स्त्री–चयन की चेतना सार्वभौमिक रही है, पर भारत ने इसे सबसे पहले “संस्कार” का रूप दिया।
स्वयंवर का नया रूप : कोर्ट मैरिज 
अब दरबार की जगह  कोर्ट है, माला की  जगह  सर्टिफिकेट,  और  साक्षी के रूप में दो गवाह। पहले वर को धनुष उठाना पड़ता था, अब बस पेन उठाना पड़ता है! फ़र्क बस इतना है— पहले  वर   को   परीक्षा   देनी   पड़ती  थी, अब  बस  शपथपत्र! जब  से कोर्ट  मैरिज  का  चलन शुरू हुआ, स्वयंवर मानो ऑनलाइन हो गया है— अब जाति, गोत्र या वर्ग कोई बाधा नहीं; वर–कन्या स्वयं तय करते हैं कि वे एक-दूसरे के योग्य हैं या नहीं।
स्वयंवर – स्वतंत्रता की शाश्वत ज्योति
वर्ण व्यवस्था ने मनुष्य को बाँटा, पर स्वयंवर ने उसे जोड़ा। दुष्यंत  और शकुंतला ने बताया कि   प्रेम   समानता   सिखाता   है,  विद्योतमा  और  कालिदास ने दिखाया कि बुद्धि बंधनों से मुक्त होती है, और आज की कोर्ट मैरिज यह प्रमाणित करती है कि समाज चाहे जैसा भी हो, चयन का अधिकार सदा अजर-अमर रहेगा।
स्वयंवर  की  यह  ज्योति  आज  भी  उतनी ही उज्ज्वल है— जब भी कोई  स्त्री  अपने  मन  से   निर्णय  लेती है, इतिहास फिर से मुस्करा उठता है।

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डाक्टर डंडा लखनवी साहब की इस पोस्ट पर मेरी  टिप्पणियाँ और डाक्टर साहब के प्रत्युत्तर :------

1)  पौराणिक-पोंगापंथी -ब्राह्मणवादी व्यवस्था मे जो छेड़-छाड़ विभिन्न वैज्ञानिक आख्याओं के साथ की गई है उससे 'कायस्थ' शब्द भी अछूता नहीं रहा है।
'कायस्थ'=क+अ+इ+स्थ
क=काया या ब्रह्मा ;
अ=अहर्निश;इ=रहने वाला;
स्थ=स्थित।
'कायस्थ' का अर्थ है ब्रह्म से अहर्निश स्थित रहने वाला सर्व-शक्तिमान व्यक्ति।

2 )  आज से दस लाख वर्ष पूर्व मानव जब अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो ज्ञान-विज्ञान का विकास भी किया। वेदों मे वर्णित मानव-कल्याण की भावना के अनुरूप शिक्षण- प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। जो लोग इस कार्य को सम्पन्न करते थे उन्हे 'कायस्थ' कहा गया। क्योंकि ये मानव की सम्पूर्ण 'काया' से संबन्धित शिक्षा देते थे अतः इन्हे 'कायस्थ' कहा गया। किसी भी अस्पताल मे आज भी जेनरल मेडिसिन विभाग का हिन्दी रूपातंरण आपको 'काय चिकित्सा विभाग' ही लिखा मिलेगा। उस समय आबादी अधिक न थी और एक ही व्यक्ति सम्पूर्ण काया से संबन्धित सम्पूर्ण जानकारी देने मे सक्षम था। किन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई शिक्षा देने हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती गई। 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा भी दी जाने लगी। शिक्षा को चार वर्णों मे बांटा गया। 

3 )  कालांतर मे व्यापार-व्यवसाय से संबन्धित वर्ग ने दुरभि-संधि करके शासन-सत्ता और पुरोहित वर्ग से मिल कर 'ब्राह्मण' को श्रेष्ठ तथा योग्यता आधारित उपाधि-वर्ण व्यवस्था को जन्मगत जाती-व्यवस्था मे परिणत कर दिया जिससे कि बहुसंख्यक 'क्षुद्र' सेवा-दाताओं को सदा-सर्वदा के लिए शोषण-उत्पीड़न का सामना करना पड़ा उनको शिक्षा से वंचित करके उनका विकास-मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया।'कायस्थ' पर ब्राह्मण ने अतिक्रमण करके उसे भी दास बना लिया और 'कल्पित' कहानी गढ़ कर चित्रगुप्त को ब्रह्मा की काया से उत्पन्न बता कर कायस्थों मे भी उच्च-निम्न का वर्गीकरण कर दिया। खेद एवं दुर्भाग्य की बात है कि आज कायस्थ-वर्ग खुद ब्राह्मणों के बुने कुचक्र को ही मान्यता दे रहा है और अपने मूल चरित्र को भूल चुका है। कहीं कायस्थ खुद को 'वैश्य' वर्ण का अंग बता रहा है तो कहीं 'क्षुद्र' वर्ण का बता कर अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है।
यह जन्मगत जाति-व्यवस्था शोषण मूलक है और मूल भारतीय अवधारणा के प्रतिकूल है। आज आवश्यकता है योग्यता मूलक वर्ण-व्यवस्था बहाली की एवं उत्पीड़क जाति-व्यवस्था के निर्मूलन की।'कायस्थ' वर्ग को अपनी मूल भूमिका का निर्वहन करते हुये भ्रष्ट ब्राह्मणवादी -जातिवादी -जन्मगत व्यवस्था को ध्वस्त करके 'योग्यता आधारित' मूल वर्ण व्यवस्था को बहाल करने की पहल करनी चाहिए।

स्वयंवर प्रथा के पसंग मे विस्तृत दृष्टिकोण रखने हेतु हार्दिक आभार।

माथुर साहब! आपकी भाषा वैज्ञानिक और समाज शास्त्रीय दृष्टि सही है। प्राचीन काल में आज की तरह विज्ञान की शाखाएं प्रति शाखाएं नहीं थी।‌ 'काय' आधीन ही विज्ञान की अन्य शाखाएं थीं, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान इत्यादि।







  ~विजय राजबली माथुर ©